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सारी सुविधाएं छोड़ खुद को खोजने निकल पड़ा यह शख्‍स, काफी दिलचस्प है यह कहानी

Prateek Pandey
Prateeknv360@gmail.com
Friday, May 3, 2019, 05:01 PM

अगर आपको बोला जाए कि आप अपनी गर्लफ्रेंड, अपनी लाखों की नौकरी को छोड़कर एक ऐसा जीवन जिए जो की बिना इलेक्ट्रिसिटी, बिना मोबाइल फोन, बगैर टेक्नोलॉजी का हो तो आप क्या कहेंगे ? बेशक आपका जवाब 'ना' ही होगा। मौजूदा वक्त में जहां युवा वर्ग की पूरी भागदौड़ भौतिक संसाधनों, सुख सुविधाओं को जुटाने की जुगत में हो रही है, वहीं आधुनिकता से लबरेज पश्चिम में एक ऐसा शख्स भी है जो पिछले कुछ वर्षों से इलेक्ट्रिसिटी एवं टेक्नोलॉजी शून्य जीवन बिता रहा है। आइये आपको इस शख्‍स के जीवन के कुछ दिलचस्प पहलुओं से अवगत कराते हैं...

कौन है यह शख्स ?

'मनीलेस मैन' के नाम से मशहूर मार्क बॉयल आयरलैंड के रहने वाले हैं। 39 वर्षीय मार्क बॉयल किताबें लिखते हैं, लेकिन दुनिया भर में इनकी पहचान 'फ्री इकोनॉमी कम्यूनिटी' के संस्थापक की है। मार्केटिंग ऑनर्स में फर्स्‍ट क्लास डिग्रीधारी मार्क ब्रिस्टल में एक ऑग्रेनिक फूड कंपनी में बतौर मैनेजर कार्यरत थे लेकिन सबकुछ छोड़कर एकांत जीवन बिताने का रास्ता चुना। मार्क ने साल 2016 में 'टैक्नोलॉजी फ्री' जीवन जीने का फैसला लिया था जो अब भी कायम है।

तीन वर्षों से जी रहें हैं एक 'टेक्नोलॉजी मुक्त' जीवन 

मार्क बॉयल पिछले तीन वर्षों से बिजली से संचालित होने वाली किसी भी चीज का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। उन्होंने अपने जीवन में हर उस चीज को प्रतिबंधित कर रखा है जिसके संचालन के लिए बिजली की जरूरत होती है। ना तो उनके पास टीवी है, ना रिकॉर्डेड संगीत सुनने का कोई सोत्र है और ना ही अपने ईमेल, फोन कॉल या सोशल मीडिया एकाउंट्स को अपडेट करना का कोई जरिया है। यहां तक कि वह रेडियो भी नहीं सुनते। वह कहते हैं कि एक आराम तलब जीवन और अपना शहर छोड़ना इतना आसान फैसला नहीं था। शुरुआत में मैं कॉफी, मैनचेस्टर यूनाइटेड और अपनी गर्लफ्रेंड को मिस करता था, लेकिन समय के साथ में प्रकृति में डूब गया और मुझे ऐसा जीवन जीने की आदत हो गयी है।

प्राकृतिक चीज़ों के साथ जी रहे हैं एक टेक्नोलॉजी फ्री जीवन 

मार्क ने डोनेगल में आस पड़ोस लोगों की सहायता से अपने रहने के लिए एक लकड़ी का मकान खुद ही तैयार किया है। भोजन के लिए वह शिकार और आसपास के पेड़ पौधों पर निर्भर हैं, कुछ सब्जियां वह खुद भी उगाते हैं। मार्क अपना टूथपेस्ट जंगली सौंफ और कटलफिश की हड्डी से खुद तैयार करते हैं। कपड़े साफ करने के लिए वह एक प्रकार के पौधे सोपरोट का इस्तेमाल करते हैं। 'टैक्नोलॉजी फ्री' जीवन के अनुभवों के बारे में वह इन दिनों वह एक किताब 'द वे होम : टेल्स ए लाइफ विदाउट टैक्नोलॉजी' लिख रहे हैं। लेखन सामग्री के नाम पर वह पेंसिल और पेपर का इस्तेमाल करते हैं। इसके साथ ही मार्क घड़ी नहीं रखते। किसी काम को करने के लिए उनका कोई निश्चित टाइम टेबल नहीं है। रोजमर्रा के काम काज के लिए वह पूरी तरह प्रकति पर निर्भर हैं। उनके सोने का समय सूर्य के प्रकाश से तय होता है। भोजन पकाने के लिए वह जंगल से लकड़ियों लाते हैं, और छोटे-छोटे टुकड़ों में काटते हैं। मार्क कहते हैं कि एक बार मैं जब लकड़ियां काटना शुरू करता हूं तो खुद को रोक नहीं पाता, मेरे हाथ बरबस ही कुल्हाड़ी पर जा रहे होते हैं। यह मेरे पसंदीदा कामों में से एक है, मैं घंटों लकड़ियां फाड़ता हूं।

महात्मा गाँधी से मिली प्रेरणा 

बकौल मार्क उन्‍होंने काफी वक्‍त महात्‍मा गांधी के जन्‍म स्‍थान पोरबंदर में बिताया है। वह महात्‍मा गांधी के नमक आंदोलन से काफी प्रभावित रहे हैं। मार्क कहते हैं कि इंसान ने धरती को काफी नुकसान पहुंचाया है। उद्योगीकरण के कारण धरती पर जीवन संकट में है। हमारे समुद्र प्लास्टिक के कचरे से अटे पड़े हैं। जंगल नष्ट हो रहे हैं। बीते 50 वर्षों में धरती के 60 फीसदी वन्यजीव विलुप्त हो चुके हैं। मैं जानना चाहता था कि वास्तव में जीवन कैसा था, सो इसकी खोज में चल पड़ा।

भौतिक जरूरतें' तनाव का कारण, बयां किया जीवन का सुखद अनुभव 

लाखों की नौकरी, गर्लफ्रेंड छोड़, खुद को खोजने निकल पड़ा यह शख्‍स, दिलचस्‍प है यह कहानी...

मार्क कहते हैं कि सभी इलेक्‍ट्रॉनिक डिवाइसें, 'भौतिक जरूरतें' तनाव का कारण हैं। मेल का जवाब देना, सोशल मीडिया पर रिएक्‍शनों का सामना करना मन को अशांत करते हैं। बेशक, टेलीविजन, न्‍यूज, मीडिया से घिरी रहने वाली हमारी लाइफ हमें सुकून नहीं देती। इन सबको छोड़ने के बाद मैं जीवन को समझ पाया हूं। एक इंसान के तौर पर मैं अपने दायरे से परिचित हो सका हूं। मुझे अपनी धरती और आस पड़ोस के प्राणियों से वास्‍तविक जुड़ाव का पता चल पाया है, जिनसे मैं बेहद प्रेम करता हूं। हैरान करने वाली बात यह भी है की मार्क पिछले 20 वर्षों से डॉक्‍टर के पास नहीं गए हैं। बकौल मार्क, लकड़ी के चूल्‍हे पर जो मन आया जब मन आया कुछ भी पका लिया। बाकी जरूरतों की चीजें जंगल से मिल जाती हैं। प्रोटीन की जरुरत लगे तो  झोपड़े से 15 मील दूर झील से मछली का शिकार कर लिया। बाकी समय खुद को जानने समझने, जंगल में विचरने, किताबें पढ़ने या खुले आसमान के नीचे प्रकृति को निहारने में बीत जाता है। यहां चिडियों की चहचहाहट में प्रकृति के गीत को महसूस करता हूं। मैं विचलित नहीं होता, अब पिछली जिंदगी याद नहीं आती, गुस्‍सा भी नहीं आता। मैं यहां पौधों के स्‍पंदन को महसूस कर रहा हूं। मैंने खुद को पाया है।

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